भारतीय समाज में एक ऐसा वर्ग जो एक वैज्ञानिकों की भूमिका निभा रहीं है जिसे हम कुम्हार कहते हैं।

 भारतीय समाज में एक ऐसा वर्ग जो एक वैज्ञानिकों की भूमिका निभा रहीं है जिसे हम कुम्हार कहते हैं।

गाथा° प्राचीन वैज्ञानिक वर्ग  कुम्हारों की ✍🏼

लेखक:- कृति कुमारी(एक क्रांतिकारी पत्रकार)🖋️

भारत देश में वर्तमान समय में वैसे तो अनेकों वर्ग,समाज मौजूद है लेकिन उसी में से कोई एक महत्वपूर्ण समाज है जो वैज्ञानिकों की भूमिका निभा रहीं हैं। जिसें हम सब कुम्हार के नाम से जानते हैं। यह कहानी हजारों लाखों वर्ष पुरानी है ऐतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज कुम्हारों की यह गाथा बहुत ही महत्वपूर्ण है जिसे भारत के इतिहासकारों ने बहुत मुश्किल से शोध कर उसे प्राप्त किया है।


भारतीय समाज में कुम्हारों की एक महत्पूर्ण भूमिका है। कुम्हार शब्द का जन्म संस्कृत भाषा के कुंभकार शब्द से हुआ जिसका अर्थ है; - मिट्टी के बर्तन बनाने वाले । इस समुदाय के प्रमुख संत श्री संत गौरा कुमहार जी' है। कुम्हार जाति सम्पूर्ण भारत के सभी धर्मो मे पाई जाती है। ये भगवान विठ्ठल और देवी रेणुका माता (येलम्मा मंदिर) की अराधना करती है। भारत में कुम्हारों को सृजनकर्ता एवं वंश वर्धक देवता भी माना जाता है। भारत देश में कुम्हारों की आबादी 10 करोड़ से भी अधिक है। इनका मुख्य कार्य मिट्टी से बर्तनों का निर्माण करना होता है। ये अपने हाथों से चाक घुमाकर मिट्टी से कई चीजों को बनाते है और अपने द्वारा निर्माण किये चीजों को अपने हाथों से रंगते है तथा सुखने के लिए भाटी में डालते है। मोहनजोदड़ो-हडप्पा 1 की खुदाई में मिले अवशेष हमारे समाज - के गौरवशाली इतिहास का बखूबी बखान करते है। दुर्भाग्य यह है कि चक्र उपयोग करने वाले कुम्हार ही आज पिछड़े है। ये बहुत ईमानदार, अत्यधिक अध्यात्मिक और कड़ी मेहनत करने वाले होते है।

कुम्हार जाति के गौरवशाली इतिहास को देखने से पता चलता है कि कला का जन्म कुम्हार के ही घर से हुआ है।

दुनिया में सबसे पहले चाक का निर्माण, चाक का आविष्कार कुम्हारों ने हीं किया हैं। इसीलिए कबीर ने कुम्हार को गुरु माना है क्योंकि शिष्य भी तो गीली मिट्टी के समान होती है। और कुम्हार भी गीली मिट्टी का उपयोग कर उपयोगी पात्र बनाते हैं जिन्हें पूजा, यज्ञ, खाने पीने के लिए इत्यादि विशेष चीजों में प्रयोग किए जाते हैं। कुम्हार अपनी मिट्टी से जो भी वस्तुएं बनाता है यह सभी तरह के मिट्टी से नहीं बनती कोई एक खास तरह की मिट्टी से कुम्हार अपनी बर्तन को बनाते हैं जिस मिट्टी में माइक्रोन्यूट्रिएंट्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। पहले के समय में कुम्हार भारत के अलग-अलग क्षेत्र के मिट्टी को लाकर उस मिट्टी से रिसर्च करते थे की कौन सा मिट्टी कैसा है और कौन सा मिट्टी बर्तन बनाने के लिए सबसे उपयोगी है किस मिट्टी में सबसे ज्यादा गुन व माइक्रोन्यूट्रिएंट्स पाए जाएंगे फिर कुम्हार वहीं मिट्टी सब को लाकर अपनी बर्तनों को बनाते थे जो पहले गुरुकुलों में ऐसी कुम्हरों की अलग पढ़ाई होती थी इसीलिए इस तथ्य से भी कुम्हारों को एक प्राचीन व पौराणिक वैज्ञानिकों वर्ग भी कह सकते हैं। विज्ञान के अनुसार मिट्टी के बर्तनो में खाना पकाने के लिए मिट्टी के बर्तनों को बहुत ही सुरक्षित माना गया हैं।

क्योंकि मिट्टी के बर्तनों में पकाया गया भोजन में आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम तथा सल्फर से भरपूर होता है जो कि हमारे शरीर के लिए काफी ज्यादा लाभदायक है। गर्मी के दिनों में भी मिट्टी के पात्रों में पानी पीने से काफी फायदे होते हैं जैसे कि लू से बचाव होता है पाचन तंत्र को दुरुस्त करता है गले के लिए फायदेमंद होता है तथा दर्द से राहत और थकान से भी राहत मिलता है।

मिट्टी के बर्तनों से बना भोजन में सबसे ज्यादा माइक्रोन्यूट्रिएंट्स पाया जाता है और उस भोजन में सबसे ज्यादा पोषक तत्व पाया जाता है। अल्युमिनियम, स्टील, तांबा, पीतल, चांदी, के भी बर्तनों से ज्यादा माइक्रोन्यूट्रिएंट्स मिट्टी के पात्रों में हैं।

एक रिसर्च के अनुसार मिट्टी के पात्र से बना दाल तैयार हों जानें के 72 घंटा बाद लैबोरेट्री में परीक्षण करने पर 100% पोषक तत्व को पाया गया।

आगे इस लेख में रामायण की एक प्रसंग को सम्मिलित किया गया जो आज के वर्तमान लोगों को जानने की आवश्यकता है जब भगवान श्री रामचंद्र जी अपनी मां की आदेश पर वह 14 वर्ष के लिए वनवास गए और भरत को राज्य दे दिया तो भरत एक बार भगवान श्री राम चंद्र से मिलने सभी के साथ वन में चले गए और  वन में दोनों भाई मिलने के बाद कई वार्तालाप हुई तो उसमें भगवान श्री रामचंद्र जी भरत से कहते हैं कि भरत जब मैं अयोध्या में था और जिस तरह में अयोध्या की देखरेख करता था तो क्या तुम भी वैसे ही अयोध्या की देखरेख करते हो?

तो भरत ने उत्तर दिया हां भैया आप जैसे अयोध्या की देखरेख करते थे मैं भी वैसा ही अयोध्या की देखरेख करता हूं। फिर श्री राम ने कहा कि जब मैं अयोध्या में था तो उस समय मैं सभी पूजनीय लोगों का सम्मान करते थे ऋषियों का, गुरुजनों का, पुरोहितों का तो क्या तुम भी वैसे ही सभी पूजनीय लोगों का सेवा-सम्मान करते हो तो भरत ने उत्तर दिया हां भैया मैं भी वैसे ही सभी पूजनीय लोगों का सम्मान करता हूं। गुरुजनों का, ऋषियों का, लेकिन पुरोहितों का सम्मान में उतना नहीं करता हूं? क्योंकि पुरोहित तो कर्मकांडी है जब परमात्मा सृष्टि के कन-कन में है? तो यह पुरोहित लोग ढोंग- पाखंड क्यों करते हैं? तब भगवान श्री रामचंद्र जी भरत को एक श्लोक बताया जो चाणक्य ने भी अपनी शास्त्र में लिखा है की "धर्मस्य मूलं अर्थम" नहीं भरत तुम्हें सायद यह मालूम नहीं की धर्म के ही मूल में अर्थ है यानी पूरी अर्थव्यवस्था है। तो भरत ने कहा भैया वो कैसे?

तो फिर श्री राम भरत को उत्तर देते हैं की एक पुरोहित जो भी पूजा-पाठ, सत्यनारायण-कथा आदि कराते हैं तो उसमें सैकड़ो तरह की सामग्रिया आती है। उनका सैकड़ो तरह की वस्तुओं का उपयोग होता है। जैसे कुम्हारों का घर से मिट्टी की वस्तुएं, महली के घर का बास की वस्तुएं, ग्वाला किसान का घर का घी दही आदि, तेली का घर का तेल आदि, ऐसे सैकड़ो तरह के वर्गों की वस्तुओं का उपयोग पूजा, सत्यनारायण कथा आदि में होता है। अगर यह परंपरा खत्म हो गया तो इन वर्गों का भरण पोषण भी खत्म हो जाएगा इनकी आय भी खत्म हो जाएगी यह लोग बेरोजगार हो जाएंगे और भूखे मरेंगे। इसीलिए पुरोहित इन समाजों का एक आज के भाषा में मार्केटिंग मैनेजर है। तब भरत को समझ में आया कि वास्तव में धर्म के ही मूल में पूरी अर्थ है, यानी अर्थव्यवस्था है। लेकिन पुरोहित लोभी नहीं होना चाहिए। उन्हें सब को छोड़कर सबसे ज्यादा सम्मान दीजिए लेकिन वह निस्वार्थ होकर पूजा पाठ कराएं तब स्वार्थी व लोभी पुरोहितों की बात नहीं है। इसमें जो निशुल्क निस्वार्थ भावना से पूजा पाठ आदि संपन्न कराता हों वैसे पुरोहितों का बात है। उन्हें सबसे भरपूर सम्मान, घर में खाने-पीने की अनाज, फल, वस्त्र आदि यजमान एक पुरोहितों को इन सब चीजों भरके भरपूर मात्रा में निस्वार्थ भावना से देकर एक पुरोहित को परिपूर्ण करना चाहिए यहीं एक यजमान का धर्म हैं।

इसीलिए हमारे पूजा पाठ सत्यनारायण कथा आदि में पुरोहितों व नाईयो को अनाज (चावल, दाल आदि), फल इत्यादि (केला, सेब, नारियल आदि), वस्त्र इत्यादि (धोती, कुर्ता, गमछी आदि) पूजा पाठ संपन्न होने पर दान में देने की चलन है। यह प्रथा आज की नहीं है? युगों युगों पुरानी यह प्रथा हैं। यह चलन है। जो आज भी हम लोग इसे जीवित रखे हैं। और जो भी अजमान अपने घर में पूजा सत्यनारायण कथा आदि कराएं तो वह ब्राह्मणों को सम्मान व ऐसी वस्तुओं से परिपूर्ण कर दे लेकिन निस्वार्थ ब्राह्मणों की ही बात की गई है इस लेख में लोभ रहित पुरोहितों का कोई स्थान नहीं है।

तो आप इस लेख में पढ़े की इतनी महान इतिहास रखने वाले कुम्हार वर्ग जिनके घर से कला का जन्म हुआ जो आज भी वैज्ञानिकों की भूमिका निभा रही है।  उन कुमारन को हम लोग छोटी निचली जाति का दर्जा दे दिए यह सब अंग्रेजों का षड्यंत्र था जो हम लोग समझ नहीं पाए। हम लोगों को के भीतर में एक दूसरे के प्रति इस तरह की घृणा उत्पन्न कर दिए इन गौरे फिरंगियों ने? वास्तव में हमारे शास्त्रों(मनुस्मृति) में कहीं भी जाती की बात नहीं कही गई! वर्ण व्यवस्था की बात कही गई। अगर आप नौकर, चकरी करते हैं! तो आप सुद्र हुए। अगर आप खेती व व्यापार आदि करते हैं! तो आप वैश्य हुए। यदि आप शस्त्र धर लोगों व देश की सीमाओं का रक्षा करते हैं तो आप क्षत्रिय हुए। और यदि आप पूजा-पाठ,यज्ञ-हवन ज्ञान बांटने आदि का काम करते हैं! तो आप ब्राह्मण हुए। यहां कोई जन्म से शुद्र व जन्म से ब्राह्मण नहीं है जो जैसा कर्म करें वह वैसे ही वर्ण में है। यहां विश्वामित्र जन्म से क्षत्रिय था, लेकिन कम से ब्राह्मण बना। भगवान परशुराम जन्म से ब्राह्मण था, लेकिन कर्म से क्षत्रिय बना। तो यह हमारे पास सैकड़ो उदाहरण होने के बावजूद हम अगर आंख बंद करके असामाजिक धारणाओं को अपनी भीतर जमा रखेंगे तो हमरा कुछ नहीं हो पाएगा हमें अपने भीतर से ऐसी मैल भरी विचारों को निकाल कर फेंकना होगा। तभी हम सभी मिलजुल कर एक साथ प्रेम पूर्वक इस समाज व राष्ट्र में रह पाएंगे।

इतनी महान इतिहास रखने वाले इन कुम्हारों की स्थिति बेहद ही दुखद है हम सभी लोगों का यह कर्तव्य होना चाहिए कि हम सभी मिलकर कुम्हारों की बनी वस्तुओं को ज्यादा से ज्यादा मात्रा में खरीदे ताकि यह प्लास्टिक और फाइबर से बनी चीजें धीरे-धीरे खत्म हो जाए और हमारे कुम्हार समाज के कुम्हार भाई विकसित हो सकें और उन्हें पहले जैसा सम्मान मिले।

कुम्हारों के ऊपर लिखा गया यह लेख कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दीजिएगा।

धन्यवाद, जय हिंद, वंदे मातरम, जय मां भारती...🙏

लेखक:-कीर्ति कुमारी (एक क्रांतिकारी पत्रकार) ✍🏼

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